Kurukshetra
जो बीत चुका है, वह
सच में बीता नहीं.
अतीत मिटता भी नहीं, दिखता भी नहीं,
क्योंकि समय उसे अपने अंदर समूह चुका है और इतिहास के उस पार हमारी सभ्यता का हिस्सा वन चुका है.
महाभारत
एक ऐसे महायुद्ध की कहानी है जब सारा भारत
धर्म और कर्म का फ़ैसला करने के लिए एक जगह जमा हो गया था कुरूप क्षेत्र में.
यह युद्ध है दो परिवारों का जिनके पूर्वज एक ही थे.
पांच पांडु थे और एक सौ कौरव.
कौरवों के साथ परिवार के सारे बुज़ुर्ग महायोधा शामिल थे और पांडवों के साथ उनका परिवार और कृष्ण थे.
धृतराष्ट्र के दरबार में चौपर्ण बिछाई गई.
सत्यवादी,
युधिष्ठिर,
धन, सम्मान, संपत्ति सब हार गए, तो पांचाली कु दांव पर लगा दिया जो पांचों पांडवों की पत्ती थी.
सत्य सत्य रागी होता है,
मिथि हज़ार करोड़ ले लेता है.
जब युद्ध के नियम तय किए गए थे, वह तलवार की धार की तरह पक्के थे और जब टूटे चल द्रौपदी की चूमियों की तरह पूरे कुरुक्षेत्र में बिखर गए.
अठारह दिन तक सूर्य रोज़ सूरतता हुआ क्षितिज निकलता
और शाम को जलती चिताओं की आग में भस्म हो जाता.
हम आज भी धर्म कर्म के उसी युद्ध में जी रहे हैं.
हमारे पांव को क्षेत्र से निकले नहीं.

